करील(कैर) की पहचान, फायदे और नुक्सान। Kair pickle ke fayde in Hindi

करील/कैर (kair pickle)

kair, pickle,tenti ka achar
kair pickle
अन्य भाषाओं में करील के नाम
संस्कृत - करीर गुढपत्र, शाकपुष्प, तिक्ष्ण, कंटक इत्यादि।
हिंदी - करील, कैर।
मारवाड़ी - ढालू, करें।
बंगाली - करील।
पंजाबी - कवडा।
मराठी - नेपति।
गुजराती - केरडीकेर।
फारसी - कबार।
हरियाणवी - टींट, टिंट, कैर।
राजस्थान - टेंटी, केर।
लेटिन - Capporis Decidua, Capporis Aphylla.

करील वृक्ष की पहचान
करील के वृक्ष 20 फुट तक बढ़ते हैं। इसके तने की गोलाई 4 फीट से लेकर 8 फीट तक की होती है। इसकी छाल आधा इंच मोटी और गहरे भूरे रंग की होती है। इसके फूल गहरे लाल रंग के होते हैं। जब इसमें फूल आते हैं तब यहां पूरा वृक्ष बहुत आकर्षक लगता है। इसके पत्ते बारिक पतले और हरे रंग के होते हैं जो सींक के रूप में होते हैं। इसी वजह से लोग बोलते हैं कि करीर में पत्ते नहीं आते। इसके फल कच्ची हालत में हरे और पकने के बाद लाल हो जाते हैं। जो गोल-गोल छोटे छोटे-छोटे चने से सोयाबीन जितने मोटे होते हैं। जेठ और अषाढ़ में इसके फल पकते हैं। इसके फल गुजरात, कच्छ, हरियाणा, राजस्थान मारवाड़ इत्यादि स्थानों में बहुत होते हैं।

गुण - दोष और प्रभाव
आयुर्वेदिक मत से करील कसैला, गर्म प्रकृति का, चरपरा, आफरा पैदा करने वाला, रूचि कारक, भेदक, विष नाशक, विरेचक और कृमि नाशक होता है। यह खांसी और श्वास में लाभदायक है। व्रण और बवासीर में इसका उपयोग फायदेमंद है। यह ग्राही, मुख की दुर्गंध दूर करने वाला तथा पित्त और मूत्र संबंधी तकलीफों को नाश करने वाला है।
इसके फूल कफ और वात को नष्ट करने वाले हल्के और रुचिकारक होते हैं। इसके कच्चे फल कफ को नष्ट करने वाले, सूजन में लाभदायक तथा पके फल कफ और पित्त नाशक है।
इसकी जड़ तीसरे दर्जे में गर्म और खुश्क हैं। फल तीसरे दर्जे में गर्म और दूसरे दर्जे में खुश्क है। किसी किसी-किसी के मत से गर्म और तर है। बीज तीसरे दर्जे में गर्म और खुश्क। पत्ते पहले दर्जे में और फूल दूसरे दर्जे में गर्म और खुश्क है अर्थात यह पूरा वृक्ष गर्म प्रकृति का है।

यह औषधि आमवात, कटिबद्ध, हिचकी, कफ और श्वास में फायदेमंद है। यह कफ के दोष को मिटाती है। फोड़े-फुंसी और बवासीर में लाभदायक है। शरीर के अंगों की सूजन को मिटाती है। इसका फूल कफ और पेट के विकार को दूर करता है। यह फालिज(लकवा) और तिल्ली की बीमारी में लाभदायक है। यह दस्तो को रोकने वाला और कब्जियत पैदा करने वाला है। यह  जोड़ों के दर्द और क्षय की बीमारी में भी लाभदायक है। इसका फल दिल को मजबूती देता है। स्मरण शक्ति और बुद्धि को बढ़ाता है। काम इंद्रिया को बलवान करता है।

इसके पत्तों और फूलों की ताकत बराबर है। इसके पत्तों का रस पेट के कीड़ों को नष्ट करता है।

इसकी नाजुक शाखाए और पत्ते पीसकर फफोलो पर लगाए जाते हैं। यह फोड़े फुंसी और प्रदाह पर काम में आती है। यह विष प्रतिरोधक है तथा जोड़ों के दर्द में भी फायदा पहुंचाती है। दांतों की पीड़ा में भी इसका चुसना फायदेमंद है।
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उपयोग
बुखार - इसकी कोमल कोपले और कोमल पत्तों को पीसकर टिकिया बनाकर हाथ की कलाई पर बांधने से फोला होकर बुखार छूट जाता है।

गर्भनिरोधक - इसकी कोपल को सामान भाग असबन्द के साथ कूट छानकर हर रोज 6 ग्राम वासी पानी के साथ मासिक धर्म के समय स्त्री को खिलाने से उसके संतान होना बंद हो जाती है और किसी तरह की तकलीफ नहीं होती।

दांत पीड़ा - इसकी कोमल कोपल को मुंह में रखकर चबाने से दांत की पीड़ा मिट जाती है।

तिल्ली - इसकी सुखी कोपलो के चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा मे लेकर 3 ग्राम कालीमिर्च के साथ प्रातकाल फंकी लेने से तिल्ली मिट जाती है।

खूनी बवासीर - इसकी 10 ग्राम जड़ को 3 किलो पानी में औटाकर जब आधा किलो पानी रह जाए तब उसके दो हिस्से कर के दिन में दो बार सुबह और शाम पिला देना चाहिए। इस प्रकार 7 से 8 दिन तक प्रयोग करने से खूनी बवासीर में खून आना बंद हो जाता है और बवासीर में बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।

जोड़ों का दर्द - इसकी लकड़ी की राख को घी में मिलाकर चाटने से जोड़ों की पीड़ा मिटती है। कमर का दर्द भी इससे नष्ट होता है।

केस वर्धक - (1)इसकी जड़ को पीसकर बालों की जड़ में मलने से बाल बढ़ते हैं।
(2)इसके फल को बिना पानी के पीसकर मलने से दाढ़ी और सिर के बाल जाम जाते हैं।

तव्चा रोग - इसकी जड़ की छाल को सिरके में पीसकर दाद, झाई और फोड़े फुंसियों पर लगाने से फायदा होता है।

विष - इसकी जड इसके दूसरे अंगों से ज्यादा प्रभावशाली है। इसमें विष नाशक शक्ति भी रहते हैं। इसलिए जहरीले जानवरों के जहर दूर करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।


जलोदर रोग - जलोदर रोग जब शरीर को जकड़ लेता है और स्वस्थ होने की उम्मीद खत्म हो जाती है तो करील की जड़ को सुखाकर उसका चूर्ण करके 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 1 सप्ताह तक खिलाएं और भुनी हुई और चिकनी चीजों से परहेज करें। इस औषधि से बड़ा लाभ होता है। आयुर्वेद के वैद्य जनों ने इस नुस्खे की बहुत तारीफ की है।

यह औषधि गर्म मिजाज वालों के मेदे, गुर्दे और दिमाग को नुकसान पहुंचाती है। इस के ज्यादा इस्तेमाल से खुजली पैदा होती हैं। इसके प्रभाव को नष्ट करने वाली अनीसुन और उस्तखददुस, शहद और कुलंजन है।
इसकी मात्रा चूर्ण के रूप में 10 ग्राम, काढे में 10 ग्राम से 20 ग्राम तक और रस के रूप में 20 ग्रा्म है।




वैद्य हेतु नुस्खे

स्वास नाशक अर्क
करील की ताजा जड़े लाकर उनके टुकड़े कर उन टुकड़ों को काटकर एक मिट्टी के बर्तन में भरकर फिर पताल यंत्र से उसका चुआ निकाल लेना चाहिए। इस चुआ की एक ग्राम की मात्रा में शक्कर के साथ लेकर ऊपर से गर्म पानी पीने से दमे का भयंकर हमला भी तत्काल शांत हो जाता है। कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से हमेशा के लिए दमे का रोग मिट जाता है और इसी अर्क को बवासीर के मस्सों पर सवेरे शाम मलने से थोड़े दिनों में मस्से सूख कर मुरझा कर गिर जाते हैं।

तांबे की सफेद भस्म
शुद्ध किए हुए तांबे के मोटे टुकड़े को या डब्बू पैसे को अग्नि में गर्म करके करील की कोपलों के रस में 50 बार बुझाना चाहिए। उसके बाद उसको इन्हीं कोपलों की लुगदी में रख कर दो से तीन बार गजपुट में फुकने से सफेद रंग की भस्म तैयार होती है। कोफलों के रस के बदले में अगर करीर का ताजा हरा लक्कड़ जो लंबाई में आठ अंगुल और मोटाई में छः अंगुल हो उसमें 8 अंगुल छेद करके उसमें उस तांबे के टुकड़े को अथवा पैसे को रखकर ऊपर करी की लकड़ी का बुरादा भर उसी का डांट लगा कर गजपुट की आंच देने से सफेद भस्म तैयार हो जाती है। अगर इसमें कुछ कसर रह जाए तो एक या दो बार इसी प्रकार करने से ठीक हो जाती है।

यह भस्म नपुंसकता, उदर रोग, श्वास रोग इत्यादि रोगों में योग्य अनुपम के साथ देने से बड़ा लाभ पहुंचाती है।
 नपुंसकता में इसको घी के साथ चाटकर ऊपर से 50 से 100gm घी पिलाना चाहिए। इससे प्यास ज्यादा लगती है। मगर चार पहर तक पानी नहीं पिलाना चाहिए। अगर प्यास ना रुके तो दूध में घी मिलाकर देना चाहिए इससे नपुंसकता में बड़ा लाभ होता है। जब तक दवा का सेवन चालू हो तब तक तेल, खटाई, लाल मिर्च वगैरह का त्याग कर देना चाहिए।
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