खरेण्टी के फायदे और नुकसान। Khareti Ke Fayde in Hindi

                                               खरेण्टी

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Khareti Herb

नाम⇨

संस्कृत⇨    बला,बलिनी, भद्रबला, जयन्ती, रक्ततंदूला, खरयष्टिका इत्यादि
हिंदी⇨         खरेंटो,  बरियार।
मुंबई⇨        बला, बरीला।
गुजराती⇨   खरेटी, बलदाना।
पंजाब⇨      खरैटी।
सिंध⇨        बरियारा।
मराठी⇨     चिकना, खीरंती।
तमिल⇨      नीलतुती।
तेलुगू⇨      अन्तिस।
लेटिन⇨     sida cordifolia

वर्णन⇨

यह एक झाड़ी नुमा वर्षजीवी वनस्पति है। इसके पत्ते 1 से 2 इंच लंबे होते हैं। यह हृदय की आकृति के होते हैं। इसके फूल हल्के पीले रंग के होते हैं जो वर्षा ऋतु में आते हैं। इसके फल बहुत छोटे छोटे होते हैं। जिसमें से राय के समान बीज निकलते हैं। इसके बीज पत्ते व जन औषधि के काम आते हैं।
khareti ke beej ke fayde
khareti ka poudha


गुण दोष और प्रभाव⇨

आयुर्वेदिक मत से खरेण्टी, कड़वी, मीठी, पित्तातिसार को नष्ट करने वाली, बलवीर्यवर्धक, कामोद्दीपक और वात तथा पित्त को नष्ट करने वाली है, इसकी जड़ की छाल का चूर्ण मिश्री मिले हुए दूध में मिलाकर पीने से बहुमूत्र रोग दूर होता है। इसका फल कसैला, मधुर, शीतवीर्य और पचने में स्वादिष्ट होता है। यह भारी, स्तम्भक, वातवर्धक तथा पित्त, कफ को और खुन सम्बंधित दोषो को दूर करने वाला होता है। गले के रोग, खूनी बवासीर, पेट सम्बंधित रोग और पागलपन में भी यह लाभदायक है।

⌛  चढते उतरते बुखार में इसका काढ़ा अदरक के रस के साथ दिया जाता है।
⌛  अंगों में कम्पन पैदा करने वाले बुखारो में यह ज्यादा लाभकारी है।
⌛  इसकी जड़ को पीसकर दूध व शक्कर के साथ मिलाकर सफेद पानी की समस्या और बहुमूत्र रोग में देते हैं।
⌛  इसके बीज कामोद्दीपक होते हैं और सुजाक में इनका उपयोग किया जाता है। पेट के दर्द और मरोड़ी के दस्तों में भी यह लाभदायक होती हैं।
⌛  आंख की अंदरूनी चोट में इसके पत्तों को पीसकर पलकों पर लगाते हैं।
⌛  गर्मी के चट्टो और दूसरे जख्मों पर इसकी जड़ की छाल को पीसकर लगाते हैं।और इसके पंचांग के काढे से जख्मों को धोते हैं जिससे बहुत जल्दी आराम होता है।

⌛  लकवा, अर्दित इत्यादि वात रोगों में मूंग के साथ इसकी जड़ का काढ़ा बना कर देते हैं और जड़ की छाल से बनाए हुए तेल से मालिश करते हैं।
⌛  पुर्तगाल और ईस्ट अफ्रीका में इसके पौधे को बच्चों की बीमारियों में काम में लेते हैं कंबोडिया में इसकी जड़े पेशाब लगाने वाली व मृदु विवेचक मानी जाती है और सुजाक तथा दाद में काम में ली जाती है।
⌛  सुजाक की बीमारी में इसके सारे पौधे का सीत निर्यास 1 से 2 औंस की मात्रा में दिन में दो से तीन बार दिया जाता है इससे पसीना आता है और पेशाब साफ होकर रोग में लाभ होता है।

अकरकरा के फायदे और नुकसान।

महर्षि चरक के मतानुसार⇨

इस के जड़ की छाल दूध और घी के साथ अत्यंत बलवर्धक होती है। बुढ़ापे की कमजोरी को भी यह दूर करती हैं फेफड़ों की दुर्बलता में इसकी जड़ की छाल को दूध के साथ 2 महीने तक देने से और रोगी को केवल दूध ही पर रखने से अच्छा लाभ होता है। खूनी बवासीर और भीतरी रक्त शिराओं में इसकी जड़ की छाल का काढ़ा उपयोगी है। सन्नी पात बुखार में इसका शीत निर्यास बार-बार पिलाया जाता है।

खरैटी या बला आयुर्वेदिक और हिंदू चिकित्सा में बहुत उपयोगी वस्तु मानी जाती हैं। हिंदू वेद्द इसको बहुत उपयोगी वस्तु मानते हैं और इसको बहुत प्राचीन काल से उपयोग में लेते आ रहे हैं। तिब्बी या मुसलमानी औषधियों में यह इसके कामोद्दीपक गुणों के कारण उपयोग में ली जाती है

khareti ke fayde in hindi
khareti ka ped

देसी औषधियों में इसका प्रयोग⇨

इसकी जड़, पत्ते और बीज सब ही चिकित्सा के काम में आते हैं यह स्वाद में कटु रहते हैं। इस जाति के सभी भेदों की जड़े शीतल, संकोचक, अग्निप्रवर्धक और पौष्टिक मानी जाती है। इन से बनाया हुआ सीत निर्यास स्नायु मंडल व मूत्राशय संबंधी बीमारियों को दूर करता है यह रक्त और पित्त के विकारों में भी लाभदायक हैं। इसके अंग सुगंधित और कटु होते हैं यह ज्वर निवारक, शांति दायक और मूत्रल समझे जाते हैं। इसके बीज कामोद्दीपक माने जाते हैं और यह सुजाक और मूत्राशय के प्रदाह की बीमारी में उपयोग में लिए जाते हैं। पेट दर्द और मरोड़ी में भी यह लाभदायक है इसके पत्ते आंखों की पीड़ा में उपयोगी हैं। इसकी जड़ का रस घाव को ठीक करने में बहुत कारगर हैं‌। और इस सारे वृक्ष का रस अनैच्छिक विर्यस्त्राव और संधिवात रोग में उपयोग में लिया जाता है। इसे अरंड के रस के साथ में शलीपद रोग में लगाने के काम में लेते हैं। इसके जड़ व  सोंठ का काढा बुखार में जिन में कंपन ज्यादा रहती है दिया जाता है। इसके जड़ के छिलके का चूर्ण दूध और शक्कर के साथ मिश्रण करके अनैच्छिक मूत्रस्राव और श्वेत प्रदर के रोगियों को दिया जाता है। बहुत सी स्नायु मंडल और बीमारियों में उदाहरणार्थ सिर दर्द और मुंह के लकवे में इसके जड़ को हींग और सेंधा नमक के साथ काम में लिया जाता है इससे एक तेल प्राप्त होता है इस तेल को दूध और सरसों के साथ मिलाकर मालिश करने के काम में लेते हैं इसे मकरध्वज और कस्तूरी के साथ मिलाकर ह्रदय को मजबूत बनाने के लिए उपयोग में लेते हैं।

औपचारिक उपयोगिता के अतिरिक्त इसका व्यापारिक महत्व भी काफी है इससे एक प्रकार का सफेद तंतु प्राप्त होता है जिससे सैल्यूलोस cellulose नामक तत्व 8 प्रतिशत पाया जाता है यह सन में सिर्फ 64% ही प्राप्त होता है कुछ दक्ष लोगों का मत है कि इससे बढ़कर सन का प्रतिनिधि और दूसरा वृक्ष नहीं हो सकता है।


औषधि विपयक उपयोग⇨

इस वनस्पति में एकेड्राइंन ०.०८५% रहता है और बीजों में ०.३% प्रतिशत रहता है यह बिल्कुल संभव है। कि अगर इसको योग्य रूप से खेती की जाए और योग्य रूप से इसे एकत्रित किया जाए तो इसके उपक्षारिय तत्व बढ़ सकते हैं। यह वनस्पति भारतवर्ष में काफी मात्रा में पैदा होती है। इसलिए एकेड्राइंन भी काफी तादात में प्राप्त किया जा सकता है। एकेड्राइंन का वृक्ष भारतवर्ष में पहाड़ियों पर पैदा होता है। इसी वजह से उसे वहां से प्राप्त करने में काफी खर्चा बैठ जाता है। यही वजह है कि एकेड्राइंन इतना महंगा है इस विषय में अन्वेषण अभी जारी है।

तगड़ा शरीर बनाने के लिए कसरत ही क्यों करें।


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