अरीठा (रीठा) के फ़ायदे और नुक़सान ! Reetha Ke Fayde, Soapnut / Sapindus Mukorossi / Sapindus Trifoliatus

रीठा / Soapnut / Sapindus Mukorossi / Sapindus Trifoliatus


अरीठा (रीठा) के फ़ायदे और नुक़सान ! Reetha Ke Fayde, Soapnut / Sapindus Mukorossi / Sapindus Trifoliatus
reetha ka ped




अरीठा की पहचान - Reetha Ki Pahachan - Reetha's identity

     अरीठे का वृक्ष दो प्रकार का होता है। एक की लेटिन में Sapindus. Trikoliatus और दूसरे को Sapipadus Nukorossi कहते हैं। यह वृक्ष प्रायः सारे भारतवर्ष में पैदा होता है। इसके पत्ते गूलर के पत्तों से बड़ें होते हैं, इसकी छाल भूरी होती है। इसके फल गुच्छों के रूप में आते हैं। इसके बीजों की गिरी पहले कुछ मीठी और पीछे कङवी लगती हैं।

     पहली जाति का अरीठा फेन वाला होता हैं और यह कपड़े धोने, सिर धोने तथा साबुन के स्थान में काम में आता है। दूसरी जाति के अरीठे के बीजों से जो तेल निकलता है वह औषधि के काम में आता है। इस झाड़ में गोंद भी लगता है।



अरीठा (रीठा) के फ़ायदे और नुक़सान ! Reetha Ke Fayde, Soapnut / Sapindus Mukorossi / Sapindus Trifoliatus
reetha plant



    अरीठा के अन्य भाषाओं में नाम - Names of Reetha in other languages

संस्कृत— अरिष्ट (arishth):, फेनिल (Fenil), रक्तबीज (Raktbeej), मंगल्य (Mangalya),। 

मारवाड़ी— अरीठों (Areetho)। 

गुजराती— अरीठा (Areetha)। 

मराठी— रीठा (reetha)। 

पंजाबी— रेठा (retha)। 

द्राविडी— योनान कोट्ट़े (Yonan Kotte)। 

तैलंगी— कुंकुडु (Kunkudu), चेट्टू (Chettu)। 

कर्नाटकी— कुकुटेकायि (KuKutekayi)। 

अरबी— बन्दक (Bandak)। 

फारसी— रित्ता (Ritta)। 

लेटिन— Sapindus Trifoliatus, Sapindus Mukorossii 

अंग्रेजी  - Soapnut.

     

     




      अरीठा के गुण-दोष और प्रभाव - Reetha Ke Gun-Dosh Aur Prabhav - Properties and effects of reetha

       आयुर्वेदिक मत के मतानुसार अरीठा पचने में चरपरा, त्रिदोषनाशक, तीक्ष्ण, गरम भारी, गर्भपातक और वमनकारक है। यह गर्भशय को निश्चेष्ट करनेवाला और विष के असर को नष्ट करनेवाला है।

     
     डाॅ० मुडीन शरीफ (Moodeensheriff) इस औषधि का वर्णन करते हुये लिखते हैं—

     मैं इस औषधि की कई दिनों से प्रयोग में रहा है। वमनकारक औषधियों में यह औषधि सब से सस्ती है। यह औषधि अपना असर बहुत शीघ्र बतलाती है व अन्य वमनकारक औषधियों की तुलना में जोशीली और अपेय रहती है। आधाशीशी और श्वास के रोग में यह औषधि बहुत लाभ पहुॉंचाती है। लेकिन मृगी तथा अपस्मार के रोग में यह औषधि लाभदायक सिद्ध नहीं हुई, इस रोग में यह केवल क्षणिक असर दिखलाती है। 


     इसके अन्दर का मगज एक उत्तम कृमिनाशक औषधि है, ऐसा कुछ भारतीय वैद्य मानते हैं, पर मैंने कभी इस औषधि से पेट के कीटाणुओं को बाहर आते नहीं देखा। 

इसकी मात्रा चार से पांच ग्रेन या दो से तीन रत्ती तक मानी जाती है, मगर अधिक मात्रा में इस्तेमाल करने पर भी हमें इसे नुकसान करते नहीं देखा। इतना ही हुआ कि वमन के साथ एक-दो पतले दस्त भी आये। 

इसकी जड़ और जड़ का छिलका बहुत कठोर होता है, जो बड़ी कठिनाई से पीसा जाता है। हमने इस औषधि के हर एक हिस्से को काढ़े के रूप में कम-ज्यादा मात्रा में उप-योग करके देखा है और इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि यह एक प्रकार की नरम, कफनिस्सारक और शान्तिदायक औषधि है। उपचार की दृष्टि से यह कमजोर है। 

दमें के अन्दर छाती में जमे हुए कफ को निकालने के लिए अरीठे से वमन कराई जाती है। एपिकाक और खड़की रास्ना की अपेक्षा इसका असर जल्दी होता है। जीर्ण कफ रोगों में इसको देने से कफ पतला होता है और हृदय को शक्ति मिलती है। कफ रोगों में इसकी बहुत छोटी मात्रा में देना चाहिये क्योंकि इससे पाचन क्रिया पर कुछ खराब असर होता है। दमे में और आधाशीशी में इसकी सुंघनी सुंघाने से तत्काल लाभ होता है। यद्यपि यह लाभ चिरस्थायी नहीं होता पर एक बार तो रोगी को तत्काल शान्ति मालूम होती है। 

अजीर्ण से पैदा हुए उदरशूल मैं इसकी गूदी की २ रत्ती की गोली बनाकर देना चाहिये। अफीम के विष को दूर करने के लिए अरीठा एक उत्तम औषधि है। इससे वमन होकर अफीम का विष नष्ट होता है।



Whole Dry Amla-Reetha-Shikakai






       कर्नल चोपड़ा के मतानुसार 

यह औषधि पौष्टिक, कफनिस्सारक, वमनकारक, क्षार युक्त और बिच्छू के डंक में उपयोगी है।


      परांजपे और रामस्वामी ऐय्यर 

ने इसका रासायनिक विश्लेषण करके यह सिद्ध किया है कि इस औषधि में N-Eicosanic Acid  (इकोसेनिक एसिड) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।


       केस और महस्कर 

के मतानुसार यह औषधि ब्राह्म-उपचार की दृष्टि से सर्पदंश और बिच्छू के डंक में निरुप-योगी है।


       उपर्युक्त अवतरणों से यह मालूम होता है कि आयुर्वेदिक औषधियों में अरीठा एक प्रधान वमनकारक औषधि है। वमनकारक होने के ही कारण यह विषनाशक भी मानी गई है। क्योंकि विष को नष्ट करने में वमन भी एक प्रधान उपाय है, इसके अतिरिक्त बेहोशी को दूर करने का भी इस औषधि में विशेष गुण है।





        अरीठा के फ़ायदे - Reetha Ke Fayde - Benefits of Reetha

हिस्टीरिया और मृगी अरीठे के फल की गिरी को पानी में घिसकर उसकी दो बार बूंदें नाक में टपकाने से तथा सिलाई के द्वारा थोड़ा सा ऑंख में ऑंजने से मृगी, हिस्टीरिया तथा और किसी भी कारण से पैदा हुई बेहोशी तुरन्त दूर हो जाती है, ऑंख में ऑंजने पर यदि जलन हो तो गाय का घी या मक्खन ऑंजने से शान्ति होती है।


       आधाशीशी - Andhasisi

अरीठे के फल को एक-दो काली मिर्च के साथ पानी में घिसकर नाक में टपकाने से आधा-शीशी का रोग तत्काल दूर होता है।


       अनन्त वायु - eternal air

प्रसव के पश्चात् वायु का कोप होने से स्त्रियों का मस्तिष्क शून्य हो जाता है, ऑंखों के आगे अन्धकार छा जाता है, दाॅंतों की बत्तीसी भिड़ जाती है और वायु की तांणें आने लगती है। ऐसे कठिन समय में अरीठे का पानी में घिसकर फेन पैदाकर ऑंख में ऑंजने से तत्काल वायु का कोप दूर होकर जादू के समान असर दिखलाई देता है।


      अरीठे की सुंघनी - smell of sweet

अरीठे का मगज, नकछिकनी, कायफल, नौसादर, सफेद मिर्च, अपामार्ग के बीज और बायबिडग्ॾ, ये बराबर लेकर कूट-पीस, छानकर चूर्ण करके रख लेना चाहिये, जब जरूरत पड़े तब उसमें से थोड़ा सा लेकर उसमें सीप का चूना, अच्छी तरह से मिलाकर सुंघाने से सर्दी, आधा शीशी, हिस्टीरिया तथा मस्तक में खून का चढ़ जाना आदि रोग दूर होते हैं।


        अरीठे का अंजन - Reetha Ka Anjan - Aretha's Anjan

सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, सांप की कांचली की राख, साबुन, हींगलू, हींग, मैन्शल, रायन के बीच और नीलाथूथा ये यह सब समान भाग लेकर इनको लहसन के रस में खरल करके फिर तुलसी के रस में खरल करना चाहिए। उसके बाद गोलियाॅं बनाकर रख लेना चाहिए। इस गोली को अरीठे के फेन में घिसकर ऑंख में अंजने से भूत, प्रेत, डाकन वगैरह के दोष, हिस्टीरिया, बेहोशी, अनन्तवायु इत्यादि रोग तत्काल दूर होते हैं।


        सत्रिपात - session fall

अरीठे का मगज, अंकोल के जड़ की छाल, समुद्रफल के बीज, विष्णुकांता के बीज और कड़वी तरोई के बीज ये सब समान भाग लेकर तुलसी के रस में खरल कर दो-दो रत्ती की गोलियाॅं बना लेनी चाहिये। रोगी की शक्ति का विचार करके एक से चार गोलियाॅं तक गरम पानी के साथ देने से उल्टी और टट्टी होकर महा भयंकर सत्रिपात दूर हो जाता है। इसके अतिरिक्त इसी औषधि से सर्पदंश, पागल कुत्ते का जहर तथा सखिया, अफीम, बच्छनाग वगैरह विषों के विकार भी वमन होकर नष्ट हो जाते हैं।


       बिच्छू का जहर - Bicchu ka Zahar - scorpion venom

अरीठे के एक फल की गिरी लेकर उसको पीसकर तीन हिस्से करके जड़ में मिला कर उसकी तीन गोलियां बना लेनी चाहिये। पांच २ मिनट में एक २ गोली ठंडे पानी के साथ देने से तथा इसी के फल को घिसकर जाॅंख में ऑंजने से और डंक पर लगाने से जहर उतरता है। इसी प्रकार अगर इसके फल के चूर्ण को तंबाकू की तरह पिया जाय तो भी विष नष्ट होता है।





      खूनी बवासीर - Khuni Bavasir - bloody hemorrhoids

अरीठे के फल में से बीज निकाल कर शेष भाग को लोहे की कढ़ाही में डालकर अग्नि पर चढ़ाने से जब वह जल कर कोयला हो जाए तब उसे उतार कर उतना ही पपड़िया कत्या मिलाकर अच्छी तरह से पीस कर कपड़छन कर लेना चाहिए। इस औषधि में से एक रत्ती औषधि लेकर मक्खन या मलाई के साथ प्रति-दिन सबेरे-शाम लेना चाहिये। इस प्रकार सात दिन तक करना आवश्यक है। जब तक दवा चले तब तक नमक और खटाई नहीं खाना चाहिये। इसके सेवन से कब्जियत, बवासीर की खुजली, बवासीर में से खून का बहना वगैरह फौरन आराम होता है। जंगलनी जड़ी बूटी नामक ग्रन्थ के लेखक लिखते हैं कि वह प्रयोग एक महात्मा की तरफ से प्रसादरूप में मिला हुआ है और इससे सौ में से नब्बे बीमारों को फायदा होता है लेकिन छ: महीने के बाद फिर पीछे रोग शुरू होने का भय रहता है। इसलिए अगर हर छठे महीने वह प्रयोग कर लिया जाए तो हमेशा के लिये आराम हो जाता है 


        मासिक धर्म की रुकावट - Masik Dharm Ki Rukavat - Menstrual interruption

अरीठे के फलों के मगज को पीस कर उनकी बत्ती बनाकर स्त्री की जननेन्द्रिय में रखने से मासिक धर्म की रुकावट मिटती है। प्रसव के समय भी यह बत्ती रखने से बिना विलम्ब के प्रसव होता है।


       केशमंजन पाउडर - Keshmanjan Powder

कपूर काचरी, नागरमोथा, दस-दस तोला और कपूर तथा अरीठे के फल की गिरी चार-चार तोला, शीकाकाई २५ तोला, सूखे हुये आंवले २०० तोला, इन सब का चूर्ण करके इनमें से ५ तोला चूर्ण ले करके १।। पाव उबलते हुए पानी के साथ १५ मिनट तक भिगोकर रखना चाहिए। बाद में मल, छानकर बालों को उस पानी में मसलना चाहिये। उसके बाद गरम पानी से बालों को खूब धो डालना चाहिए। इससे बाल अत्यन्त मुलायम और रेशम के समान सुहावने हो जाते हैं तथा सिर के अन्दर यदि जूं-लीक होती है तो वह भी मर जाती है।

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